रेडलाइन में शुमार बटागुर प्रजाति के कछुओं से चंबल का किनारा हो गया खुशनुमा, जगा नया विश्वास

तीन राज्यों मे फैली चंबल सेंचुरी वैसे तो दुर्लभ प्रजाति के सैकडों जलचरों को जीवनदान दे रही है। इसके बावजूद यहां पर कछुओं के संरक्षण ने चंबल की सूरत को एक नया आयाम दे दिया है। इस बार यहां पांच हजार से अधिक कछुओं ने जन्म लिया है। इनमें शेड्यूल-1 की श्रेणी में शुमार (साल) बटागुर और ढोंड प्रजाति के कछुए भी शामिल हैं। इस प्रजाति के कछुए विश्व में विलुप्तप्राय माने जाते हैं।

चंबल का किनारा हो गया खुशनुमा
चंबल सेंचुरी में फरवरी और मार्च में मादा कछुओं ने नदी के किनारे बालू में अंडे दिए थे। तब से चंबल सेंचुरी विभाग के अधिकारी इनकी निगरानी करने में लगे हुए थे। मई माह के दूसरे पखवाड़े में अंडों की हैचिंग (अंडों को सेकने की प्रक्रिया) शुरू हुई। गढ़ायता, हरलालपुरा, पिनाहट, मऊ, मुकुटपुरा हैचरी क्षेत्र में नन्हें मेहमानों ने जन्म लिया और बालू पर सरकते हुए नदी में पहुंचना शुरू हो गए। पहले दौर में बटागुर प्रजाति और उसके बाद अन्य प्रजातियों की हैचिंग की गई। अच्छी बात ये है कि इस बार 5792 कछुए जन्मे, हालांकि पिछले सिर्फ यह संख्या केवल 1824 पर सिमट गई थी। इस बार चंबल सेंचुरी में 300 घोंसले रखे थे। जिनमे सेंचुरी कर्मियो ने 6085 अंडों की गिनती की थी।

30 अंडे तक देती है मादा
मादा कछुआ 30 अंडे तक देती है। सामान्यत: वह रात में अंडे देती है। अंडे देने के बाद उसको मिट्टी तथा बालू से ढक देती है। विभिन्न प्रजातियों के अंडों से निकलने का वक्त भिन्न-भिन्न होता है। अंडे से निकलने में बच्चों को 60 से 120 दिन का वक्त लगता है। कभी गंगा-यमुना समेत सभी प्रमुख नदियों में पाया जाना वाला कछुआ अब सिर्फ चंबल सेंचुरी में ही बचा है। शायद यही कारण है कि प्रदेश सरकार ने इस विलुप्तप्राय कछुए को बचाने के लिए टर्टल सर्वाइवल एलाइंस से मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) किया है।

चंबल में हैं आठ प्रजातियां

पूरे देश में कछुओं की 28 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से 14 सिर्फ उत्तर प्रदेश में हैं, जिनमें से आठ चंबल में हैं। इनमें वर्ष, ढोर, स्योतर, कटहावा, सुंदरी, कोरी पचेड़ा, पचेड़ा प्रमुख हैं।

दो केंद्रो में होती है हैचिंग
टर्टल्स सर्वाइवल एलाइंस द्वारा चंबल सेंचुरी क्षेत्र में बनाए गए दो केंद्रों पर वर्ष के कछुओं की हैचिंग कराई जाती है। इसके लिए वह तट के किनारे मादा कछुओं द्वारा अंडों को तलाशते हैं। इटावा के गढ़ायता कछुआ संरक्षण केंद्र और देवरी ईको केंद्र पर बाद में हैचिंग कराई जाती है।

डीएफओ की राय

चंबल सेंचुरी के डीएफओ आनंद कुमार ने कहा कि विभागीय टीम ने चंबल नदी पर सतर्कता बढ़ा दी है। जन्म लेने वाले कछुओं के मूवमेंट की निगरानी की जा रही है। चंबल नदी में सात प्रकार की दुर्लभ प्रजातियों के कछुओं का संरक्षण किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का तर्क
सेंटर फॉर वाइल्ड लाइफ स्टडीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. शैलेंद्र सिंह बताते हैं वर्ष (बटागुर कछुआ) क्रिटीकल एंडेंजर्ड प्रजातियों में शामिल है। विश्व में चंबल एकमात्र ऐसा जगह है, जहां यह पाया जाता है। हम हर साल दो से तीन हैचरी में उनके घोंसलों को बचाते हैं। हम उनके थोड़ा बड़ा होने तक उनकी देखरेख करते हैं, बाद में उन्हें नदी में छोड़ दिया जाता है, जहां उनका सर्वाइवल कीमत ज्यादा होता है। 

कोऑर्डिनेटर भाष्कर दीक्षित बताते हैं कि बढ़ता प्रदूषण, नदी में अवैध खनन, नदी के किनारे होने वाली खेती इनके लिए सबसे बड़ा खतरा है। चंबल सेंचुरी में जैकॉल से भी इन्हें खतरा रहता है। वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञों की मानें तो चंबल में सर्वाधिक संकटग्रस्त माने जाने वाले घड़ियाल की तुलना में वर्ष ज्यादा संकट में है। इसीलिए उसे क्रिटिकल एंडेंजर्ड कैटेगरी में रखा गया है।