कभी कभी ऐसी घटनाएं हो जाती हैं जिन्हें देखने सुनने के बाद भी विश्वास करना मुश्किल हो जाता है। वाराणसी में सोमवार को ऐसा ही एक वाक्या सामने आया। इंजीनियरिंग के जिस छात्र की शादी की तैयारियों में परिवार वाले लगे थे। घर पर लड़की वाले देखने आने वाले थे। वह छात्र यह कहते हुए अचानक लापता हो गया कि उसे शादी नहीं करनी है। यह घटना 25 साल पहले हुई थी। कोई भी परिवार इतने साल तक जवान बेटे के गायब रहने के बाद उसके जिंदा होने की उम्मीद खो ही देता है। इस छात्र के परिवार ने भी खो दिया था। हिन्दू परंपरा के अनुसार 25 साल पूरा होने पर उसके श्राद्ध की तैयारी भी हो रही थी। 
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। ढाई दशक बाद सोमवार को जब वही छात्र वाराणसी के सामने घाट स्थित अपना घर आश्रम में अपनों से मिला तो आंसू की धारा बह निकली। हम बात कर रहे हैं बिहार के डेहरी आन सोन रोहतास के रहने वाले सत्यप्रकाश गुप्ता की। करीब 25 साल पहले सत्य प्रकाश इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। उसी दौरान परिवार वालों ने उनके लिए लड़की देखना भी शुरू कर दिया। सत्यप्रकाश लगातार शादी नहीं करने की बातें करते रहते और परिवार के लोग उन्हें समझाने की कोशिश में लगे रहते। एक दिन पता चला कि लड़की वाले सत्यप्रकाश को देखने उनके घर आ रहे हैं। इससे पहले कि लड़की वाले घर आते सत्यप्रकाश घर से लापता हो गए। 

परिवारवालों ने जवान बेटे की तलाश में कोई कसर नहीं छोड़ी। तमाम जगहों पर तलाश करने के बाद भी सत्यप्रकाश नहीं मिले तो उनके मिलने की उम्मीद छोड़ दी। घर से निकलने के बाद सत्यप्रकाश इधर उधऱ भटकते रहे। भटकते हुए किसी तरह बनारस पहुंच गए। यहां रेलवे स्टेशन से कुछ दूरी पर स्थित सिगरा पर चंदुआ सट्टी सब्जी मार्केट के किनारे सड़क पर पड़े रहते। कोई कुछ देता तो खा लेते नहीं तो बिना खाये ही कई कई दिन गुजर जाता। इससे कई बीमारियों ने भी उन्हें घेर लिया। ठीक से बोलने की स्थिति भी नहीं रही। पिछले साल उन्हें सड़क किनारे इस तरह पड़ा देख अपना घऱ आश्रम को किसी ने सूचना दी। अपना घर वालों सिगरा पहुंचे और सत्यप्रकाश को अपने आश्रम ले आए। यहां उनकी देखभाल शुरू हुई तो बीमारियां भी ठीक होने लगीं। उनकी याद्दाश्त ने भी थोड़ा साथ दिया और आश्रम वालों को अपने घर के बारे में बताना शुरू किया। 

आश्रम वालों ने सत्यप्रकाश के बताए पते पर डेहरी आनसोन में संपर्क किया। एक बारगी तो परिजनों को विश्वास ही नहीं हुआ। लेकिन फोन पर उनकी तस्वीरें देखी तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दोनों छोटे भाई तत्काल वाराणसी के लिए रवाना हो गए। सोमवार की दोपहर आश्रम पहुंचे और 25 साल बाद बड़े भाई को देखते ही सीने से लिपट कर रो पड़े। सत्यप्रकाश को लेने पहुंचे छोटे भाई रोशन ने बताया कि हम लोगों ने ही नहीं पूरे गांव ने भइया के मिलने की उम्मीद बहुत पहले छोड़ दी थी। हिन्दू धर्म के अनुसार अगर 25 साल तक कोई न मिले तो उसका श्राद्ध कर दिया जाता है। हम लोग भी भइया के श्राद्ध की तैयारी कर रहे थे।  

सोमवार को सत्यप्रकाश के परिवार जैसी खुशी तीन और परिवारों को नसीब हुई। लावारिस हालत में सड़क किनारे से उठा कर लाए गए तीन लोग अपने अपने परिवारों से मिले। आजमगढ़ के फुतोलीगांव से 80 वर्षीय सच्चिदानंद उपाध्याय कई साल बाद अपनी पत्नी से मिले। गाजीपुर के श्रीकृष्णा और कोलकाता के अतुल का भी परिवार वालों से मिलन कराया गया। श्रीकृष्णा सौतेली मां के व्यवहार से आहत होकर घर से भाग निकले थे। किसी ट्रेन दुर्घटना में अपना एक हाथ और एक पैर का पंजा भी गंवा चुके थे। अतुल मानसिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण यहां तक पहुंचे थे। उनके पैरों को कुत्तों ने भी जख्मी कर दिया था।