आपने रामायण में समुंद्र पर तैरते हुए पत्थरों से पुल बनाने के दृश्य तो देखे ही होंगे। नल-नील नामक वानरों द्वारा पानी पर छोड़े गए सभी पत्थर डूबते नहीं थे और उनकी सहायता से श्रीलंका तक समुंद्र पर वानर सेना ने पूरा पुल बना लिया था। लेकिन आम जीवन में कोई भी पत्थर या ईंट पानी में डालोगे तो वह डूब जाती है। लेकिन इन दिनों क्षेत्र के गांव कुड़ल में पानी में तैर रही एक ईंट चर्चा का विषय बनी हुई है। कोई ग्रामीण इसे चमत्कार मान रहे हैं तो साइंस इसे चमत्कार नहीं, बल्कि विज्ञान बता रही है। इस ईटं का वजन 2 किलो 350 ग्राम है।
हुआ यूं कि  निकटवर्ती गांव कुड़ल में पिछले 3 दिन से पानी में तैरने वाली ईंट की चर्चाएं क्षेत्र में जोरों पर चल रही हैं। गांव कुड़ल निवासी श्रीभगवान के घर पर मिली यह ईट वर्षों पुरानी है। श्रीभगवान ने बताया कि सन 1955 के आसपास उसके दादा अमीलाल ने गांव में ही भट्टे पर गांव में ही पकाई थीं। उन्होंने इन ईंटों से दो कमरों का निर्माण किया था। करीब 65 वर्ष बाद इन कमरों जर्जर हालत हुई तो उनके पोते श्रीभगवान ने कमरों को छोड़कर नया मकान बनाया है। चार दिन पहले श्रीभगवान इन ईटों को पानी में भिगोकर चारदीवारी में लगा रहे थे, तब उनमें से एक ईट पानी में ऊपर तैरने लगी तो उसे आश्चर्य हुआ। 

उसने उस ईट को निकालकर दोबारा से पानी में डूबोया, लेकिन वह पानी से बाहर आकर तैरने लगी। आर्य स्कूल के प्रोफेसर जितेंद्र दूरियां और फिजिक्स प्रोफेसर वीना सेन ने कहा कि ईंट के पानी में न डूबने का वैज्ञानिक कारण हो सकता है।  उन्होंने बताया कि आर्कमिडीज के सिद्धांत के अनुसार कोई वस्तु द्रव में तैर सकती है। ईंट बनने की प्रक्रिया में हो सकता है कि उसके अंदर हवा समाहित हो गई हो और इस कारण से ईट का घनत्व, द्रव के घनत्व से कम है। इस तरह से ईंट का न डूबने का कारण आर्किमिडीज सिद्धांत से आसानी से जस्टी किया जा सकता है।